नई दिल्ली: उपराष्ट्रपति चुनाव (Vice Presidential Election) को लेकर चल रही अटकलों पर विराम लग गया है। सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने महाराष्ट्र के राज्यपाल सी.पी. राधाकृष्णन को अपना उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित किया है । यह फैसला रविवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई भारतीय जनता पार्टी (BJP) के संसदीय बोर्ड की बैठक में लिया गया । पार्टी अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने इस निर्णय की घोषणा करते हुए बताया कि 68 वर्षीय राधाकृष्णन के नाम पर एनडीए के सहयोगियों के साथ व्यापक चर्चा के बाद सहमति बनी है ।

यह घोषणा मौजूदा उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ के 21 जुलाई को स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए अचानक इस्तीफा देने के बाद हुई है । उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव 9 सितंबर को होना है, और नामांकन दाखिल करने की अंतिम तिथि 22 अगस्त है ।
कौन हैं सी.पी. राधाकृष्णन? एक लंबा राजनीतिक सफर
चंद्रपुरम पोन्नुस्वामी राधाकृष्णन, जिन्हें सी.पी. के नाम से जाना जाता है, दक्षिण भारत के एक अनुभवी और जमीनी नेता हैं । उनका सार्वजनिक जीवन चार दशकों से भी अधिक समय का है, जिसमें उन्होंने कई महत्वपूर्ण पदों पर अपनी सेवाएं दी हैं:
राज्यपाल: वह वर्तमान में 31 जुलाई, 2024 से महाराष्ट्र के 24वें राज्यपाल के रूप में कार्यरत हैं । इससे पहले वह फरवरी 2023 से जुलाई 2024 तक झारखंड के राज्यपाल रह चुके हैं । इस दौरान उन्होंने तेलंगाना के राज्यपाल और पुडुचेरी के उपराज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार भी संभाला ।
सांसद: राधाकृष्णन तमिलनाडु की कोयंबटूर लोकसभा सीट से दो बार सांसद चुने जा चुके हैं ।
पार्टी संगठन: वह भाजपा की तमिलनाडु इकाई के प्रदेश अध्यक्ष भी रह चुके हैं ।
वैचारिक पृष्ठभूमि: उनका जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से रहा है और उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत भारतीय जनसंघ के सदस्य के रूप में की थी ।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राधाकृष्णन की उम्मीदवारी का स्वागत करते हुए सोशल मीडिया पर लिखा, “अपने लंबे सार्वजनिक जीवन में, थिरु सी.पी. राधाकृष्णन जी ने अपनी लगन, विनम्रता और बुद्धिमत्ता से खुद को प्रतिष्ठित किया है। उन्होंने हमेशा सामुदायिक सेवा और हाशिए पर मौजूद लोगों के सशक्तीकरण पर ध्यान केंद्रित किया है।”
इस चयन के पीछे की रणनीति और राजनीतिक संदेश
सी.पी. राधाकृष्णन का चयन केवल एक संवैधानिक पद को भरने की कवायद नहीं है, बल्कि इसके गहरे राजनीतिक मायने हैं। यह भाजपा की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है:
दक्षिण भारत पर फोकस: यह कदम भाजपा के “दक्षिण मिशन” का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पार्टी कर्नाटक को छोड़कर अन्य दक्षिणी राज्यों, विशेषकर तमिलनाडु में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए संघर्ष कर रही है । राधाकृष्णन के माध्यम से भाजपा तमिलनाडु और अन्य दक्षिणी राज्यों में एक सकारात्मक संदेश देना चाहती है ।
OBC सामाजिक समीकरण: राधाकृष्णन तमिलनाडु के प्रभावशाली ओबीसी गौंडर (कोंगु वेल्लार) समुदाय से आते हैं । यह चयन भाजपा की ओबीसी सामाजिक इंजीनियरिंग की रणनीति को आगे बढ़ाता है। तमिलनाडु में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई भी इसी समुदाय से हैं ।
एक समावेशी चेहरा: राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राधाकृष्णन की छवि एक शांत और समावेशी नेता की है, जो उनके पूर्ववर्ती जगदीप धनखड़ के कार्यकाल से अलग है । उनके द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों के साथ सौहार्दपूर्ण संबंध रहे हैं, जो राज्यसभा के सभापति के रूप में सदन चलाने में मददगार साबित हो सकता है ।
विपक्ष की रणनीति और संख्या का खेल
जहां एनडीए ने अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी है, वहीं विपक्षी INDIA गठबंधन भी इस चुनाव में अपना एक “वैचारिक” उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रहा है । हालांकि, संख्या बल पूरी तरह से एनडीए के पक्ष में है। एनडीए के पास लोकसभा और राज्यसभा को मिलाकर 427 सांसद हैं, जबकि जीत के लिए 392 वोटों की ही आवश्यकता है । ऐसे में राधाकृष्णन का अगला उपराष्ट्रपति चुना जाना लगभग तय माना जा रहा है।
राधाकृष्णन का चयन तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी द्रमुक (DMK) के लिए भी एक दुविधा की स्थिति पैदा कर सकता है। उसे यह तय करना होगा कि वह अपने राज्य के उम्मीदवार का समर्थन करे या विपक्षी गठबंधन के साथ खड़ी रहे ।
कुल मिलाकर, सी.पी. राधाकृष्णन की उम्मीदवारी भाजपा के लिए एक साथ कई लक्ष्यों को साधने वाला कदम है। यह न केवल एक अनुभवी नेता को संवैधानिक पद पर ला रहा है, बल्कि दक्षिण भारत में पार्टी के विस्तार और सामाजिक समीकरणों को मजबूत करने की एक बड़ी राजनीतिक रणनीति का भी हिस्सा है।
इस राजनीतिक घटनाक्रम पर आपके क्या विचार हैं? क्या यह भाजपा का एक मास्टरस्ट्रोक है? अपनी राय नीचे कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।



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