‘सन ऑफ सरदार 2’ रिव्यू

‘सन ऑफ सरदार 2’ रिव्यू: स्कॉटलैंड की हवा में कॉमेडी का स्वाद फीका, दोहरी पहचान और देशभक्ति में उलझी कहानी

‘सन ऑफ सरदार 2’ मूवी रिव्यू: स्कॉटलैंड की वादियों में अजय देवगन की वापसी, पाकिस्तान पर पंच, दोहरी पहचान की कॉमिक चालें—पर कमजोर कहानी, फीकी केमिस्ट्री और जबरन ह्यूमर की वजह से पिछड़ता है यह सीक्वल। पढ़ें पूरी समीक्षा, जानें क्या ‘सन ऑफ सरदार’ का जादू लौट पाया या सिर्फ पुरानी यादें ही बचीं?

‘सन ऑफ सरदार 2’ रिव्यू
‘सन ऑफ सरदार 2’ रिव्यू

1 अगस्त 2025 को रिलीज़ हुई अजय देवगन की फिल्म ‘सन ऑफ सरदार 2’ दर्शकों के लिए ढेर सारी उम्मीदें लेकर आई थी। लेकिन क्या यह सीक्वल अपने पहले भाग जैसी धूम मचा सका? इस बार कहानी भारत नहीं, बल्कि स्कॉटलैंड की वादियों में पहुंची है, जहां कॉमेडी, रोमांस और देशभक्ति के बीच फिल्म खुद अपनी दिशा तलाशती नजर आती है।

कहानी में कितना दम?

फिल्म की शुरुआत होती है जसी (अजय देवगन) से, जो अपनी पत्नी से डिवोर्स नोटिस पाकर स्कॉटलैंड पहुंचते हैं। वहीं उनकी मुलाकात होती है पाकिस्तानी डांसर राबिया (मृणाल ठाकुर) से। कहानी में ट्विस्ट तब आता है जब जसी को दोहरी पहचान निभानी पड़ती है—एक, राबिया के पिता जैसा बनने की कोशिश और दूसरा, एक फर्जी आर्मी जवान का रोल। इस झूठ-सच और इंडिया-पाक टकराव के बीच हास्य और इमोशन की तलाश की जाती है।

कमजोर कड़ियाँ जो फिल्म को पीछे खींचती हैं

  • जबरदस्ती की कॉमेडी: कई डायलॉग्स और सिचुएशन ऐसे लगते हैं जैसे उन्हें हंसाने के लिए ज़बरदस्ती गढ़ा गया हो। ह्यूमर ऑर्गेनिक नहीं, बल्कि स्क्रिप्टेड लगता है।
  • फीकी केमिस्ट्री: अजय और मृणाल की जोड़ी स्क्रीन पर खास प्रभाव नहीं छोड़ती। रोमांटिक ट्रैक कमजोर और अनइमोशनल है।
  • एक्शन की कमी: अजय देवगन को एक्शन के लिए जाना जाता है, लेकिन इस फिल्म में वे ज्यादातर समय केवल संवादों में ही उलझे नजर आते हैं।
  • बेमेल म्यूजिक और लोकेशन: स्कॉटलैंड की खूबसूरती भी कहानी को सपोर्ट नहीं कर पाती और गाने याद नहीं रह जाते।

सपोर्टिंग कास्ट की चमक

रवि किशन, संजय मिश्रा और दीपक डोबरियाल जैसे कलाकार फिल्म में थोड़ा रंग भरते हैं। खासकर दीपक का ट्रांसजेंडर किरदार और संजय मिश्रा का गैंगस्टर रोल थोड़ी देर के लिए फिल्म को एंटरटेनिंग बनाते हैं।

इंडिया-पाकिस्तान पंचलाइन: कब हंसाते, कब थकाते

फिल्म में इंडिया-पाकिस्तान के चुटकुले भरपूर हैं, लेकिन कई जगह यह ज़रूरत से ज्यादा दोहराए जाते हैं, जिससे मज़ा कम और उबाऊपन ज्यादा महसूस होता है। ये पंचलाइन कुछ जगहों पर दर्शकों को हंसाती हैं, पर बार-बार आने से असर खो देती हैं।

क्या फैमिली एंटरटेनमेंट बन पाई?

‘सन ऑफ सरदार 2’ साफ-सुथरी फिल्म है, जिसे परिवार के साथ देखा जा सकता है। लेकिन वह पागलपन, एनर्जी और देसी मस्ती जो पहले पार्ट में थी, यहां नदारद है। फिल्म हर जनर को छूने की कोशिश करती है—रोमांस, कॉमेडी, देशभक्ति—लेकिन किसी में भी पूरी तरह सफल नहीं हो पाती।

निष्कर्ष

अगर आप सिर्फ अजय देवगन के फैन हैं या बिना दिमाग लगाए हल्की-फुल्की कॉमेडी देखना चाहते हैं, तो ‘सन ऑफ सरदार 2’ एक बार देखी जा सकती है। लेकिन स्क्रिप्ट, डायरेक्शन और मनोरंजन की उम्मीद कम रखें। यह सीक्वल उस ऊंचाई को नहीं छू पाता जो पहले पार्ट ने हासिल की थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *