हेमा मालिनी का खुलासा: धर्मेंद्र बेटियों ईशा और अहाना

हेमा मालिनी का बड़ा खुलासा: धर्मेंद्र बेटियों को लेकर थे बेहद पारंपरिक, फिल्मों में करियर बनाने से भी किया था मना

हेमा मालिनी का खुलासा: धर्मेंद्र बेटियों ईशा और अहाना को लेकर थे बेहद पारंपरिक और सुरक्षात्मक, वेस्टर्न कपड़ों से परहेज़, फिल्मों में करियर बनाने पर रोक – जानिए उनके पालन-पोषण से जुड़ी अनसुनी बातें, परिवार की संस्कृति और पिता के प्यार की गहराई

हेमा मालिनी का खुलासा: धर्मेंद्र बेटियों ईशा और अहाना

बॉलीवुड की ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी ने हाल ही में एक पुराने इंटरव्यू के दौरान खुलासा किया कि उनके पति और दिग्गज अभिनेता धर्मेंद्र अपनी बेटियों ईशा देओल और अहाना देओल के पालन-पोषण को लेकर बेहद सजग और सुरक्षात्मक थे। उनके सोचने का तरीका पारंपरिक था और वे अपनी बेटियों को एक खास अनुशासन में बड़ा करना चाहते थे।

सलवार-कमीज पहनना था अनकहा नियम

हेमा मालिनी ने बताया कि जब भी धर्मेंद्र घर पर होते, ईशा और अहाना तुरंत वेस्टर्न कपड़े बदलकर सलवार-कमीज पहन लेती थीं। यह उनके पिता के प्रति सम्मान और संस्कार का संकेत था। हालांकि धर्मेंद्र कभी जबरदस्ती नहीं करते थे, लेकिन बेटियों को यह पता था कि वे उन्हें पारंपरिक लिबास में देखना पसंद करते हैं।

हेमा ने मुस्कराते हुए कहा, “अगर उनके पापा को सलवार-कमीज पसंद है, तो बेटियां वही पहनती थीं। इसमें किसी दबाव की बात नहीं थी, बल्कि प्यार और आदर छुपा था।”

फिल्मों में करियर को लेकर धर्मेंद्र की कड़ी सोच

धर्मेंद्र हमेशा चाहते थे कि उनकी बेटियां नृत्य, संगीत जैसे पारंपरिक कला क्षेत्रों में आगे बढ़ें, लेकिन फिल्मों से दूर रहें। वे फिल्म इंडस्ट्री के माहौल को बेटियों के लिए उपयुक्त नहीं मानते थे। हेमा मालिनी ने बताया कि धर्मेंद्र ने कई बार ईशा के फिल्मी करियर को लेकर चिंता जताई थी।

ईशा देओल ने भी यह स्वीकार किया कि उनके पिताजी चाहते थे कि वे जल्दी शादी करें और पारिवारिक जीवन को प्राथमिकता दें। हालांकि बाद में धर्मेंद्र ने बेटियों की पसंद और निर्णय को स्वीकार किया, लेकिन उनका रुख हमेशा पारंपरिक ही रहा।

पारिवारिक मूल्यों और संस्कारों की झलक

धर्मेंद्र और हेमा मालिनी की शादी 1980 में हुई थी। दोनों ने अपनी बेटियों की परवरिश सादगी, संस्कृति और अनुशासन से भरे माहौल में की। धर्मेंद्र एक सख्त लेकिन बेहद प्यार करने वाले पिता रहे हैं। उन्होंने बेटियों को हर फैसले में मार्गदर्शन दिया, लेकिन हमेशा उनकी सुरक्षा और भलाई को प्राथमिकता दी।

क्या ऐसा सुरक्षात्मक रवैया जरूरी है?

आज के दौर में जहां स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता को महत्व दिया जाता है, वहीं धर्मेंद्र जैसे पिता की पारंपरिक सोच पर बहस होती रही है। हालांकि कई लोग मानते हैं कि एक सीमा तक यह संरक्षण बच्चों के लिए अच्छा होता है, खासकर जब वह प्रेम और समझदारी के साथ दिया जाए।

क्या आपको लगता है कि धर्मेंद्र जैसा सुरक्षात्मक रवैया आज के समय में भी जरूरी है? क्या पारंपरिक सोच बच्चों की आज़ादी को सीमित करती है या उन्हें सुरक्षित रखती है? अपनी राय नीचे कमेंट में ज़रूर बताएं।

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