आवारा कुत्तों की समस्या: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और नीदरलैंड का सफल ‘बेंचमार्क मॉडल’
भारत में आवारा कुत्तों की बढ़ती आबादी और उससे जुड़ी घटनाएं एक गंभीर सामाजिक और प्रशासनिक चुनौती बन चुकी हैं। इसी समस्या से निपटने के लिए हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक दूरगामी फैसला सुनाते हुए दिल्ली-एनसीआर की सरकारों और नागरिक प्राधिकरणों को सड़कों से आवारा कुत्तों को हटाकर उन्हें आश्रय गृहों (शेल्टर होम्स) में रखने का निर्देश दिया है। यह फैसला इस मुद्दे पर एक नई बहस छेड़ता है कि भारत के शहर इस चुनौती से कैसे निपटें। एक ओर जहां भारतीय शहर अलग-अलग रणनीतियों के साथ संघर्ष कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर नीदरलैंड ने इस समस्या को लगभग खत्म करके दुनिया के सामने एक मिसाल पेश की है।

भारतीय शहरों के प्रयास और चुनौतियाँ
भारत के विभिन्न शहर आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए अपने-अपने स्तर पर प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उनके तरीकों में काफी भिन्नता है:
मुंबई: यहां 2025 में आवारा कुत्तों की संख्या 90,700 से अधिक है। मुंबई में कुत्तों को उनकी जगह से हटाए बिना गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के साथ मिलकर नसबंदी और एंटी-रेबीज टीकाकरण मॉडल पर काम किया जा रहा है।
कोलकाता: 2024 के नियमों के अनुसार, यहां आवारा कुत्तों को केवल निर्धारित क्षेत्रों में और दिन में दो बार (सुबह 9 बजे से पहले और रात 9 बजे के बाद) ही खाना खिलाने की अनुमति है। पुलिस इन नियमों को लागू करती है और कुत्तों को जहर देने के मामलों में गिरफ्तारी भी करती है।
चंडीगढ़: यहां 2023 में कुत्ते के काटने के 10,621 मामले सामने आए। शहर प्रशासन इलाज के लिए ₹10,000 और मांस के नुकसान पर ₹20,000 का मुआवजा देता है। इसके अलावा, छह प्रतिबंधित आक्रामक नस्लों को पालने पर ₹5,000 और कुत्तों को बिना पट्टे, चिप और पंजीकरण के रखने पर ₹20,000 का जुर्माना है।
कोच्चि: यहां एक पशु जन्म नियंत्रण (ABC) केंद्र चलाया जाता है, जहाँ नसबंदी के बाद कुत्तों को 48 घंटों के भीतर छोड़ दिया जाता है, जबकि आक्रामक कुत्तों को 72 घंटे तक निगरानी में रखा जाता है। शहर का लक्ष्य हर महीने 2,000 कुत्तों की नसबंदी करना है, और इसके बजट का 90% हिस्सा NGOs से आता है।
नीदरलैंड का सफल ‘बेंचमार्क मॉडल’
नीदरलैंड ने एक व्यापक और मानवीय दृष्टिकोण अपनाकर खुद को आवारा कुत्तों से मुक्त देश बना लिया है। उनकी रणनीति कई स्तंभों पर आधारित है:
व्यापक नसबंदी कार्यक्रम: सरकार द्वारा वित्त पोषित इस कार्यक्रम के तहत 70% से अधिक मादा कुत्तों की नसबंदी की गई, जिससे उनकी आबादी को नियंत्रित करने में मदद मिली।
सख्त पशु कल्याण कानून: जानवरों के साथ दुर्व्यवहार या उन्हें छोड़ने पर तीन साल तक की जेल और $16,000–$18,500 (लगभग 13 से 15 लाख रुपये) तक का भारी जुर्माना लगाया जाता है।
पिल्लों की खरीद पर उच्च कर: पिल्लों की खरीद को हतोत्साहित करने के लिए उच्च कर लगाया गया, जिससे लोगों ने खरीदने के बजाय कुत्तों को गोद लेने पर ध्यान केंद्रित किया।
राष्ट्रव्यापी गोद लेने का अभियान: सरकार ने बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाए, जिससे कुत्तों को गोद लेने की प्रवृत्ति बढ़ी।
इस मॉडल का परिणाम यह हुआ कि आज नीदरलैंड के 90% से अधिक परिवार कुत्तों को गोद लेते हैं, और वहां की सड़कों पर आवारा कुत्ते लगभग नहीं हैं। यह मॉडल दिखाता है कि केवल नसबंदी ही नहीं, बल्कि सख्त कानून, आर्थिक निरुत्साहन और सामाजिक जागरूकता का एक समन्वित प्रयास ही इस समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है।
अस्वीकरण (Disclaimer): यह लेख 12 अगस्त, 2025 तक उपलब्ध समाचार रिपोर्टों और सार्वजनिक सूचनाओं पर आधारित है। यहां प्रस्तुत तथ्य और आंकड़े केवल सूचनात्मक उद्देश्यों के लिए हैं। विभिन्न शहरों में नियम और नीतियां परिवर्तन के अधीन हैं।



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