अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत के उत्पादों पर 25% तक टैरिफ लगाए जाने की घोषणा के बाद भारत-अमेरिका व्यापारिक संबंधों में तनाव बढ़ गया है। 1 अगस्त 2025 से लागू इस फैसले के बावजूद भारत ने बिना किसी जल्दबाज़ी के अमेरिकी दबाव को ठुकरा दिया है। मोदी सरकार का फोकस घरेलू किसानों, छोटे उद्योगों और रणनीतिक हितों की सुरक्षा पर है। इस फैसले का असर भारत-अमेरिका व्यापार, वैश्विक कूटनीति और चीन से संबंधों पर भी दिखाई दे रहा है।

किसानों और MSMEs की सुरक्षा क्यों बनी पहली प्राथमिकता?
भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि अमेरिकी डील में ऐसे प्रावधान थे जो भारत के कृषि क्षेत्र और एमएसएमई (सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम) को नुकसान पहुंचा सकते थे। अमेरिका चाहता था कि भारत जैव-संशोधित (GM) खाद्य उत्पादों और सब्सिडी वाले एग्रीकल्चर एक्सपोर्ट्स के लिए बाज़ार खोले, लेकिन इससे भारतीय किसानों की जीविका पर सीधा असर पड़ता। इसी वजह से भारत ने UK के साथ की गई डील की तरह कृषि और डेयरी सेक्टर को यहां भी संरक्षित रखा।
अमेरिका से ज्यादा विकल्पों पर काम कर रहा भारत
भारत अब बहुपक्षीय व्यापार मॉडल अपना रहा है। उसने यूके, यूरोपीय यूनियन, मालदीव और ASEAN देशों के साथ समझौतों की प्रक्रिया तेज़ की है ताकि अमेरिकी निर्भरता कम हो सके। साथ ही भारत अब चीन के प्रभाव को संतुलित करने के लिए अमेरिका की रणनीतिक ज़रूरत बन चुका है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिका भारत को नाराज़ नहीं कर सकता क्योंकि भारत एशिया में एक मजबूत साझेदार बन चुका है।
क्या ट्रंप के टैरिफ का भारत पर असली असर पड़ेगा?
भारत के कुल निर्यात में अमेरिका का हिस्सा करीब 6-7% ही है। यानी अगर टैरिफ से नुकसान होता भी है, तो वह सीमित होगा। भारत की रणनीति ऐसे क्षेत्रों पर केंद्रित है जहां सबसे ज़्यादा प्रभाव पड़ सकता है — जैसे कि कृषि, डेयरी और लघु उद्योग। यही वजह है कि सरकार टैरिफ को तुरंत स्वीकारने की बजाय दीर्घकालिक रणनीति पर काम कर रही है।
राजनीतिक संदेश: समझौता भारत की शर्तों पर ही होगा
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने साफ कहा है कि भारत किसी समयसीमा या डेडलाइन के दबाव में समझौता नहीं करेगा। अमेरिका के साथ बातचीत जारी है और उम्मीद जताई जा रही है कि सितंबर-अक्टूबर तक कोई निर्णय आ सकता है। लेकिन भारत किसी भी हालत में अपने किसानों और MSMEs के हितों से समझौता नहीं करेगा।
आगे की चुनौती और रणनीति
भारत को अब स्टील, ऑटो और फार्मा जैसे क्षेत्रों में अमेरिकी टैरिफ से राहत की उम्मीद है। अमेरिका से बातचीत के अब तक 5 दौर हो चुके हैं और अगस्त में अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल भारत दौरे पर आने वाला है। कई किसान संगठन और उद्योग निकाय पहले ही सरकार से अपील कर चुके हैं कि वह संवेदनशील सेक्टर्स में कोई समझौता न करें।
क्या आपको लगता है भारत का रुख सही है? क्या भारत को अमेरिकी दबाव में झुकना चाहिए? अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर दें।



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